लोकसभा चुनाव के दौरान ही मोदी ने स्पष्ट किया था कि सरकार बनने के बाद कालाधन रखने वालों को बख्शा नहीं जाएगा। इधर, जैसे ही सरकार का गठन हुआ मोदी सरकार ने कालाधन के काले मालिकों पर कार्यवाही शुरू कर दी, जिसका असर अब व्यापक रूप से देखने को मिल रहा है।
दरअसल, मोदी सरकार ने कालेधन को लेकर देश की जनता को आश्वस्त किया था कि इस पर वह कड़े कदम उठाएगी और साथ ही दोषियों पर भी उचित कार्रवाई करेगी। मोदी सरकार को सत्ता में आए दो वर्ष से अधिक समय हो चुका है, तब यह जरूरी हो जाता है कि सरकार के कथनी और करनी का मूल्यांकन किया जाए। अगर हम सरकार के कालेधन के कथनी और करनी का मूल्यांकन करें, तो परिणाम बेहद सकारात्मक देखने को मिलेंगे। इसका मूल यह है कि सरकार ने कालेधन के कारोबारियों पर बड़ी शालीनता से कड़ी कार्रवाई की है।
बहरहाल, अगर काले धन पर चर्चा की जाए, तो निश्चित रूप से सरकार ने इस पर कुछ बड़े और महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। मिसाल के तौर पर सरकार ने कालेधन पर सक्रियता दिखाते हुए कैबिनेट की पहली बैठक में ही सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में कालेधन के लिए जस्टिस एम.बी.शाह की अध्यक्षता में एसआईटी का गठन किया। मोदी सरकार कितनी गंभीर है, इस मसले पर इसका अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि कोर्ट के बार–बार फटकार के बावजूद उस समय की यूपीए नीति की सरकार ने कमेटी गठित करने की जहमत नहीं उठाई।
इधर, दूसरी तरफ मोदी के नेतृत्व वाली नई सरकार ने सबसे पहले इस मसले पर विचार कर कोर्ट के आदेश का सम्मान किया। गौरतलब है कि कालेधन का मुद्दा हमेशा ही ख़बरों में बना रहता है और विपक्ष भी इस पर सरकार की आलोचना करने को हमेशा तत्पर रहता है। ज्ञातव्य हो कि कुछ सालों पहले तक हमारे देश का कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं था, जहां से भ्रष्टाचार और कालेधन की बू न आती रही हो, लेकिन अब स्थिति इसके ठीक विपरीत है।
खैर, कालाधन किसी भी देश की अर्थव्यवस्था में सेंध लगाने के लिए काफी है और इससे विकास के कार्य भी प्रभावित होते हैं। मोदी सरकार ने कालेधन और भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए कई अहम फैसले लिए हैं, जिनसे घरेलू और विदेश स्तर पर कालेधन में कमी आई है।
दरअसल, केंद्र सरकार ने स्विस अकाउंट की जानकारी इकठ्ठा करने के लिए स्विट्ज़रलैंड सरकार के साथ ऑटोमैटिक इनफार्मेशन एक्सचेंज का समझौता किया। इसके अलावा सरकार विदेशों में जमा कालेधन को वापस लाने के लिए सख्त जुर्माने के प्रावधानों वाला द ब्लैक मनी एंड इम्पोजिशन ऑफ़ टैक्स एक्ट, 2015 लेकर आई, साथ ही केंद्र सरकार ने 2 लाख से ऊपर की खरीदी पर पैन कार्ड को भी अनिवार्य कर दिया है।
गौरतलब है कि मोदी सरकार द्वारा 1जून, 2016 को शुरू की गई इनकम डिक्लेरेशन स्कीम (आईडीएस), जिसकी अंतिम तिथि 30 सितम्बर, 2016 थी, यह भी अब कारगर साबित होती दिखी । इस अघोषित आय खुलासे की योजना से अब तक सरकार को 65,250 करोड़ रुपये मिले और सरकार को इससे 30 हज़ार करोड़ रुपये टैक्स के रूप में मिलेंगे। इस योजना के तहत आय का खुलासा करने पर 45 प्रतिशत टैक्स देना होगा, जिसमें 30 प्रतिशत इनकम टैक्स, 7.5 प्रतिशत पेनल्टी और 7.5 प्रतिशत कृषि कल्याण टैक्स शामिल हैं। अगर मोदी सरकार के कालेधन पर प्रतिबद्धता को आंकने का प्रयत्न करें तो यह आंकड़े काफी हद तक स्थिति को स्पष्ट कर देते हैं।
दरअसल, मोदी सरकार ने पिछले दो वर्षों में 50,000 करोड़ रुपये की कर चोरी पकड़ी, 21,000 करोड़ रुपये की अघोषित आय का खुलासा किया, 3,963 करोड़ रुपये का तस्करी का सामान जब्त किया और 1,466 मामलों में क़ानूनी कार्रवाई शुरू की। अलबत्ता सरकार की भ्रष्टाचार और कालेधन विरोधी नीतियों का ही असर है कि स्विस बैंक में भारतीयों के धन में रिकॉर्ड गिरावट दर्ज की गई। स्विस नेशनल बैंक (एसएनबी) की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक भारतीयों के स्विस अकाउंट में एक तिहाई की रिकॉर्ड कमी आई है। स्विस खातों में भारतीयों का धन 1.2 बिलियन फ्रांक (8,392करोड़) रह गया है।
गौरतलब है कि 1997 के बाद से जब से स्विस बैंक ने यह आंकड़े सार्वजनिक करने शुरू किये तब से लेकर अब तक यह भारतीयों के धन में आई सबसे बड़ी गिरावट है। जाहिर है कि यह सभी आंकड़े सरकार की प्रतिबद्धता और कार्यशैली को दर्शाते हैं, जिससे आगे और भी सुखद परिणाम देखने को मिल सकते हैं। इन सबके बावजूद भी मोदी विरोध के अंध में डूबे हुए लोगों को यह कार्रवाई मामूली सी लगती है।
यकीनन, इससे यह भी स्पष्ट होता है कि कालेधन को लेकर इनकी आंखों पर पूर्वाग्रह की काली पट्टी लगी हुई है, इस पट्टी को हटाए बगैर कालेधन के मसले पर सरकार कितनी गंभीरता व चतुराई से काम कर रही है, यह समझना मुश्किल है। हमें इस सच को स्वीकारना होगा की मोदी सरकार ने देश को काले धन को लेकर जो भरोसा दिया था उस पर वह खरी उतर रही है।



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